वो रानी पद्मावती

पिता का गुरुर थी

सिंघल का सुरूर थी

शरीर से वो सादगी

वो रानी पद्मावती, वो रानी पद्मावती।
चांद भी उसपे मरे

वो चांदनी से परे

खिलजी का वो ख्वाब थी

जुगनू ओ की आस थी

वो सब से नायब थी

वो रानी पद्मावती, वो रानी पद्मावती।
कंगनों में धार थी

शब्दो मे एक आग थी

आंखों से वो रागिनी

वो रानी पद्मावती, वो रानी पद्मावती।
राजा की वो जान थी,

राजपूतो का सम्मान थी,

मेवाड़ का अभिमान थी

वो रानी पद्मावती, वो रानी पद्मावती।
चिता में लिपटी वो थी

प्रेम में सती हुई

वो रानी पदमावती, वो रानी पदमावती।

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हिन्दू-मुस्लिम

जो तोहफा तू, सुकरान में,

जो गीता तू, कुरान में!
जो श्लोक तू, तो आयत में,

सबात तू, हयात में!

मंदिर है तू मस्जिद हु में,

अगर पूजा तू, नमाज़ में!
दीवाली तू , तो ईद में,

इफ़्तार का उपवास में!
आज से

हिन्दू तू और मुस्लिम हु में।

कुछ सवाल है तुज़से

क्या तू आज भी माथे की बिंदी गलत जगह लगाती है ताकि वो सही कर सके,

वैसे ही जैसे मैं किया करता था!
क्या तु अब भी बेवजह दुनिया से खफा रहती है ताकि वो उटपटांग हरकते कर तुझे मना सके, वैसे ही जैसे में मनाया करता था!
सर्द रातो में चांद के नीचे तारो के बीच चलते चलते तेरी उंगलिया उसकी उंगलियो को भी थाम लेती है,

वैसे ही जैसे मेरी उंगलियो को थामा करती थी!
क्या बता दिए तेरे सारे ख्वाब ताकि वो उसे पूरा करने की जद्दोजहद में लग जाये,

वैसे ही जैसे में लगा रहता था!
क्या तु उसके साथ भी वादा-फरेबी कर उसे छोड़ने वाली है,

वैसे ही जैसे मुझे छोड़ा था!

हर दिल टूटा हुआ है

आजकल बिना गलती किये जुक ते हो?

कौन है जिसके लिए तुम लिखते हो?
सुनो
ना इश्क हुआ है, ना करीब गया हूं किसी की

में तो आज भी तलाश में हु खुद की।
पर जहा देखु हर दिल कभी टूटा हुआ सा लगता है,

हर किसी का किसी से साथ छुटा हुआ सा लगता है!
हर कोई जूठी कसमे खाने लगा है,

बिना इश्क़ के साथ निभाने लगा है

और ये नाकाम सी कौशिशे छुपाने में लगा है,
हमे इल्म भी नही वो दर्द किस तरह चुभता होगा,

तुम सब ने तो महसूस किया है तुम्हे तो पता ही होगा!
इसीलिए लिखता हूं के शायद मेरे शब्द किसी को तो रास आ जाये

जो बिछड़ने की कगार पे है वो पास आ जाये,